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मॉनसून की बेरुखी

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देश के आधे से ज्यादा राज्यों में मॉनसून ने दस्तख़ दे दी है । बादलों की तो आंख मिचौली है लेकिन बारिश नदारद है । कई राज्यों में मॉनसून कमजोर पड़ चुका है । पिछले एक दशक से समय पर बारिश नहीं होना एक गंभीर समस्या के रूप में देखा जा रहा है ।

पर्यावरण का जिस तरह से दोहन समुदाय ने किया है उसका खामियाजा आज हम सभी को भुगतना होगा । प्रकृति सूद समेत वापस देती है । हम न अब पेड़ लगाते है और न ही वर्ष जल का संचयन करते है । साल में एक दिन सिर्फ़ दिखावे के लिए पेड़ लगाना और वास्तविक रूप से पेड़ों की सुरक्षा और संवर्धन करना अलग है । आधुनिक जीवन शैली ने लोगों को प्रकृति से दूर कर दिया है । इन सभी का असर भी पर्यावरण पर पड़ा है । चारों तरफ बड़ी बड़ी बिल्डिंग, पक्की सड़कें और बढ़ती आबादी ने धरती का सीना चीर दिया है । पेड़ काट काट कर घर बने है और छोटे तालाबो को भर कर घरों का निर्माण किया जा रहा है ।

आज से 30 साल पहले समय पर वर्षा और शीत ऋतु आती थी । आम ग्रामीण जनजीवन वर्षा के ऊपर निर्भर है । सरकार ने प्रदूषण को बढ़ावा देने में कोई कसर नहीं छोड़ी है । खुलेआम पॉलीथिन बेचा जाता है । आज लोग गर्व से सीना तान कर पॉलीथिन में साग सब्जी लेकर घर जाते है । यही पॉलीथिन फिर जमीन में जाती है और न गलती है और न सड़ती है । धरती को बंजर बनाने में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका है ।

हमारी आदते अगर नहीं सुधरेगी तो यह पीढ़ी शायद आखिरी होगी जो मॉनसून को देख सकेगी । हमने खुद ही मॉनसून की बेरुखी को निमंत्रण दिया है और अब इसका परिणाम भी हमे ही भुगतना होगा ।

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