भारत को एक समय दूध और दही का देश कहा जाता था । ग्रामीण जीवन में गाय का हमेशा से ही बहुत महत्व रहा है और आज भी है । कृषि कार्य की उपयोगिता के साथ घरेलू दूध, दही, मट्ठा, घी के लिए गाय का दूध सर्वोत्तम माना जाता है । पूर्व में भारत में देशी गाएं ही पालने के दृष्टिकोण से सबसे श्रेष्ठ माने जाती थी । इसके पीछे करन था कि इसे पालने में कम खर्च होता है और यह कृषि संबंधी जरूरतों को भी पूरा करते है । धान काटने के बाद पुआल, मकई की दण्डी और घास, जैसी सामग्री पर भी देशी गाय को पाला जा सकता है ।
विगत तीन चार दशक से देशी गाय को पालने में काफी कमी आई है । चूंकि देशी गाय ज्यादातर छोटे किसान और ग्रामीण परिवार ही पालते है । लेकिन सरकार ने देशी गायों को बढ़ावा देना लगभग बंद कर दिया है । सब्सिडी की प्रक्रिया इतनी जटिल और लंबी है कि ग्रामीण और छोटे किसान सरकारी दफ्तर दौड़ कर थक जाते हैं । ऊपर से विदेशी कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिये सरकार ने खाद को बढ़ावा दिया है । पहले देशी गाय के गोबर से ही खाद बनायी जाती थी लेकिन अब परिदृश्य बिल्कुल अलग है । फसल के दोगुने उत्पादन के लिए किसान अब विदेशी खाद का प्रयोग ही करते है । सरकार के फ्री योजना ने भी ग्रामीण जीवनशैली में बदलाव लाया है । अब लोग बिना काम किए भी लाभ उठाना चाहते है ।
भारत को अगर फिर से दूध और दही का देश बनाना है तो सरकार को देशी गाय के संवर्धन और संरक्षण को बढ़ावा देना चाहिए । ऐसा करने से ग्रामीण लोगों की आर्थिक स्थिति में भी सुधार आएगा और दुग्ध उत्पादन के साथ साथ पोषण युक्त खाद्य भी लोगों को मिल सकेगा ।

