बिहार, भोजपुर की पारंपरिक पीड़िया पेंटिंग को GI (भौगोलिक संकेतक) टैग मिल गया है। इसके साथ ही इस लोककला को न सिर्फ एक विशिष्ट पहचान मिली है, बल्कि कानूनी संरक्षण भी प्राप्त हुआ है। यह उपलब्धि भोजपुरी संस्कृति और उसकी समृद्ध परंपरा के लिए बड़ी सफलता मानी जा रही है।
इस उपलब्धि के पीछे बिहार के आरा जिले की सांस्कृतिक संस्था सर्जना न्यास और उसके अध्यक्ष, वरिष्ठ चित्रकार संजीव सिन्हा की अहम भूमिका रही है। संजीव सिन्हा पिछले करीब 30 वर्षों से भोजपुरी लोककला और संस्कृति को सहेजने और आगे बढ़ाने में जुटे हैं। उन्होंने लोकगीतों, शादी-विवाह की परंपराओं, खेती-किसानी और ग्रामीण जीवन को अपनी चित्रकला के माध्यम से व्यापक पहचान दिलाने का प्रयास किया है।
भोजपुर क्षेत्र में पीढ़ियों से महिलाएं घरों की मिट्टी की दीवारों पर पीड़िया पेंटिंग बनाती रही हैं। GI टैग मिलने के बाद अब यह कला गांवों की दीवारों से निकलकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक अपनी पहचान बना सकेगी। इससे कलाकारों, खासकर ग्रामीण महिलाओं के लिए रोजगार और आजीविका के नए अवसर भी पैदा होंगे।
भले ही भोजपुरी भाषा को अब तक संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान नहीं मिला हो, लेकिन पीड़िया पेंटिंग को मिला यह सम्मान भोजपुरी संस्कृति की बड़ी और ऐतिहासिक जीत है।
भोजपुरी बिहार की पीड़िया पेंटिंग अब हुई ग्लोबल

